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A Tryst with Royalty - Bikaner & Jaisalmer - Day 3 - The Havelis of Jaisalmer - Part 1- Hindi Version


Bikaner & Jaisalmer - Patwa Haveli of Jaisalmer or Patwon Ki Haveli
बीकानेर एवं जैसलमेर - पटवा हवेली अथवा पटवों की हवेली 

A Tryst with Royalty - Bikaner & Jaisalmer - Day 3 - The Havelis of Jaisalmer - Part 1



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बीकानेर एवं जैसलमेर - पटवों की हवेली - 

                        हवेली शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा से हुई है जो की एक बहुत बड़े शानदार घर का प्रतीक है। जैसलमेर में कुछ बहुत ही सुन्दर हवेलियां हैं जैसे पटवों की हवेली, नथमल जी की हवेली, सलीम सिंह की हवेली। इन सब हवेलियों में सबसे भव्य और प्रसिद्द पटवों की हवेली है। 

खाना खाने के पश्चात गाइड की सलाह से घूमने का कार्यक्रम बना और यह तय हुआ की आज जैसलमेर दर्शन हवेलियों से ही शुरू किया जायेगा और किले को कल के लिए रखा गया। गाड़ी हवेली के काफी निकट तक जा सकती थी। हमने गाड़ी खड़ी और हवेली की ओर चल पड़े। पटवों की हवेली एक हवेली न हो कर पांच हवेलियों का समूह है। बाहर सड़क से हवेली की एक पक्ष दिखाई देता है साथ में हे एक बड़ा सा दरवाज़ा है, जिसमें से हो कर हम एक संकरी गली में पहुँच गए जहाँ पर यह पाँचों हवेलियां हैं। 
Narrow lane and the entrance of the havelis.
संकरी गली  स्थित हवेलियां और उनका प्रवेश द्वार 
Facade of the Havelis as seen from the main Road
मुख्य  सड़क से  हवेलियों का सामने का दृश्य 

Entrance of the Patwa Havelis from the main road
मुख्य सड़क से हवेलियों में जाने का दरवाज़ा 

पहली ही नज़र में हवेलियां आपको दांतों तले ऊँगली दबाने के लिए मजबूर कर देती हैं। यह हवेलियाँ जैसलमेर के पीले पत्थर से बनी हुई हैं। बाहर से दिखने वाले झरोखों पर  इतनी सुन्दर नक्काशी की गयी है कि  आँखों पर विश्वास ही नहीं होता।  सिर्फ छैनी  हथौड़ी का प्रयोग करते हुए कारीगरों ने जैसे पत्थरों में ही खूबसूरत गीत की रचना कर दी हो। सामने से खूबसूरती से नक्काशी हुए साठ  झरोखे दिखाई देते हैं और इन में लगे हुए लकड़ी के दरवाज़ों पर भी उतनी ही सुन्दर नक्काशी देख कर हमें यह निर्णय कर पाना मुश्किल हो रहा था की कौन सी नक्काशी ज़्यादा सुन्दर है । इन हवेलियों को पूरा होने में साठ साल लगे थे। 


बीकानेर एवं जैसलमेर - पटवों की हवेली का इतिहास 

                 जैसा कि मैंने पिछली पोस्ट में लिखा था कि जैसलमेर भारत से पर्शिया और अफ्रीका के सड़क व्यापार मार्ग पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। पटवा लोग जैसलमेर के व्यपारी थे। व्यपार मार्ग पर चलने वाले व्यापारिओं से संबंधों के चलते हुए उनका व्यपार बढ़ता गया और वे और समृद्ध होते चले गए। पटवा सेठ लोग मुख्यतः सोने और चांदी की ज़री का व्यापार करते थे। वे अन्य व्यपारीयों को ब्याज पर पैसे देने के अतिरिक्त, सोना, चांदी, अफीम का व्यपार भी करते थे। धीरे धीरे वह इतने अमीर हो गए कि वे जैसलमेर के राजा को भी पैसे उधार देने लग पड़े। इसलिए जैसलमेर के महारावल ने इन सेठ लोगों को जो कि असल में बाफना थे, को पटवा की उपाधि से सम्मानित किया और वे पटवा के नाम से प्रसिद्ध हो गए। 

                       समृद्धि के दौर में सेठ गुमान चंद पटवा ने इन हवेलियों को बनवाना शुरू किया। उसने अपने पांच पुत्रों के लिए पांच हवेलियों का निर्माण शुरू करवाया। इन हवेलियों को बनवाने में साठ साल लग गए इसलिए गुमान चंद जी अपने जीवन काल में इन हवेलियों को पूरा होता नहीं देख पाए। एक किंवदन्ती के अनुसार एक जैन मुनि ने पटवा सेठों को अपने व्यपार जैसलमेर में न स्थापित करने की सलाह दी थी। परन्तु उन्होंने अपना व्यपार  जैसलमेर में स्थापित कर लिया था जिसके कारण सफलता की ऊंचाइयों को छूने के बाद उनका व्यपार घटने लगा। इस लिए उन्होंने अपना व्यपार  जैसलमेर से बाहर पुनर्स्थापित कर लिया। 

                     परन्तु एक अधिक तर्कसंगत बात यह है कि अंग्रेज़ों के आने के बाद बम्बई बंदरगाह से जल मार्ग के द्वारा व्यपार होने लगा।  यह थल मार्ग से सस्ता, आसान एवं सुरक्षित था। इस कारण थल मार्ग पर चलने वाले कारवां धीरे धीरे काम होने लगे। क्यों की पटवा लोगों का व्यपार इन कारवां पर आधारित  इसलिए  उनका व्यपार भी काम होने लगा और वे लोग जैसलमेर छोड़ कर अन्य जगहों पर व्यपार की तलाश में निकल गए। 

                   जब सेठ लोग जैसलमेर छोड़ कर चले गए तो धीरे धीरे रखरखाव के लिए रख छोड़े लोग ही हवेलियों के मालिक बन बैठे। एक समय में यह हवेलियां एक बार होटल बनाने के लिए बिकने के कगार पर थीं। उस समय कोठारी नामक एक अन्य मारवाड़ी सेठ ने इस धरोहर को बचाने के लिये कदम बढ़ाया और एक  सबसे पहली हवेळी और जो सबसे भव्य हवेली है, खरीद ली। उन्होंने इसकी मुरम्मत करवाई और उसे लोगों के दर्शनार्थ खोल दिया। ऐसे माटी के सपूत को शत शत नमन। आज इस हवेली के इलावा एक हवेली ASI  और तीन अन्य  पर अभी भी अन्य  लोगों का कब्ज़ा है।  
                            

बीकानेर एवं जैसलमेर - पटवों की हवेली की निर्माणकला 

                    पटवा हवेलियों में मूलतः राजपूताना शैली देखने को मिलती है परन्तु पटवा लोगों के व्यापारिक सम्बन्ध पर्शिया  जैसे दूर दराज के क्षेत्रों से होने के कारण अन्य शैलियों का असर भी देखने को मिलता है।  जैसलमेर में गर्मी जब अपना कहर  बरपाती है तो तापमान बहुत ऊपर चला जाता है। हवेलियों में लकड़ी की छत और मिट्टी के फर्श के प्रयोग से अंदर का तापमान आरामदायक हो जाता था। हवेली के अंदर बड़े बड़े तहखाने भी हैं जो कि अनाज एवं अन्य व्यापारिक वस्तुओं के भंडारण के लिए प्रयुक्त होते थे। इन तहखानों की दीवारों में सोना चांदी रखने के लिए गुप्त तिजोरियां बनी हुई है, जिन्हे  चालाकी से पत्थर की स्लैब से इस प्रकार ढक  दिया गया  है की इनका पता ही नहीं चलता। 
intricately carved Jharokhas
सुन्दर नक्काशीदार झरोखे 

another view of Jharokhas and delicately carved wooden doors
सुन्दर नक्काशीदार झरोखों और उनमें लगे लकड़ी दरवाज़े की नक्काशी आप को असमंजस में डाल देती है  कि किस की  नक्काशी अधिक  सुन्दर है।    

The carving in the stone leaves you awestruck.
झरोखों की नक्काशी ऐसी है मानों कारीगर ने एक सुन्दर गीत लिख डाला हो। 


                           हवेली का सबसे  भाग उसके झरोखे हैं जो इसके  पर  हैं। इन  में कारीगरों के फूल पत्तीयों को मानो जीवंत कर दिया है। इसके साथ पत्थर की जाली को इतनी बारीकी से काढ़ा गया है कि इनकी तारीफ़ के लिए शब्द नहीं मिलते हैं। जो बात और हैरान करती है कि उस समय किसी मशीन का प्रयोग नहीं किया गया और सारा काम कारीगरों ने हाथ से किया पर सुंदरता और सटीकता में उन्होंने आज की मशीनों को भी मात दे दी।

                           बाहर से हवेली की सुंदरता से भौंचक्के रह जाने के बाद हम हवेली के अंदर गए।संकरी सी सीढ़ियां चढ़ के हम जिस कमरे में पहुंचे उसमें बहुत ही सुन्दर शीशे का काम किया गया था।

Beautiful mirror work welcomes you, when you enter the Haveli
हवेली में आपका स्वागत शीशे के काम से युक्त एक सुन्दर सा कमरा करता है   

            इसी कमरे की एक और फोटो जिसमें राजस्थान के लोगों के जीवन से जुड़े हुए भित्ति चित्र, चमचमाती हुए सुनहरे रंग  की उस्ता शैली के चित्र और सुन्दर शीशे का काम अपने सुंदरता से और भव्यता से चकाचौंध कर रहे थे। पीछे सुन्दर नक्काशी वाले लकड़ी के दरवाज़े भव्यता की तस्वीर को पूरा कर रहे थे।

Beautiful Usta work, Murals Belgian mirror work
अत्यंत सुन्दर दीवारों और चाट पर भित्ति चित्र उस्ता शैली के चित्र और रंगीन कांच का  काम 

                 हवेली के बहुत सारे कमरों को अजायब घर में बदल दिया गया था। इन कमरों में पटवा सेठ लोगों द्वारा प्रयुक्त वस्तुऐं प्रदर्शित थीं। इन्हें देख कर हमें पटवा सेठों के समृद्ध जीवन की झलक मिलती है

Munim ji Ka Kamra
मुनीम जी का कमरा 

पहला कमरा मुनीम जी का कमरा था। मुनीम व्यापार में एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। इस कमरे में मुनीम और पटवा सेठ बैठा करते थे।  इस कमरे में आज भी पुरानी बहियां, तिजोरी और देवी लक्ष्मी का चित्र है। इस कमरे में आने वाले  व्यपारियों की खातिरदारी होती थी एवं व्यपारिक सौदे होते थे। आने वाले व्यापारिओं के खातिरदारी के लिए पंखा, हुक्का रेडियो और अफीम का शरबत तैयार करने का यंत्र आज भी प्रदर्शित हैं।  इसी कमरे में पैसों का लेन देन, व्यापारिक सौदे और अन्य काम होते थे। यहीं पर मुनीम सौदों और लेन  देन को बही खातों  में दर्ज कर करते थे। यहां पर पड़ी कुछ मोहरें शायद व्यापारिक प्रोनोट को सत्यापित करने के लिए प्रयोग में लाई जाती होंगी।

Old almirahs to store business documents
मुनीम जी के कमरे की पुरानी अलमारियां जिनमे व्यपारिक कागज़ रखे जाते थे 
                          दीवारों के अंदर ही अलमारियां बनी हुईं थी जिनमें व्यपार से सम्बंधित कागज़ रखे जाते थे।


An old typewriter in Munim ji ka Kamna, used to prepare business documents
मुनीम जी के कमरे का  पुराना टाइपराइटर

Living room with opulent furniture
समृद्ध साजोसामान वाला कमरा जो सेठ जी का ऑफिस प्रतीत  होता है 
 इस कमरे का वैभवपूर्ण फर्नीचर सेठ जी के ऑफिस होने की तरफ इशारा करता है।  यहाँ पर एक लिखने का मेज़, मीटिंग में प्रयोग होने वाले गोल मेज़, कुछ मोहरें, एक पुराना टेलीफोन और एक बड़ी सी पेंटिंग  प्रदर्शित हैं।

Another view of the same room
उसी कमरे का एक और दृश्य 


A Camera mounted on a tripod on display
स्टैंड पर लगा हुआ कैमरा 

Ornately carved wooden ceiling
भव्य नक्काशीदार छत 
क्रमशः

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