Your ads Here

Srikhand Mahadev Yatra - A trip to heaven and Back - Day 5 - The Retreat (Hindi version)

श्रीखंड महादेव यात्रा के दौरान बादलों से ढंका पर्वत 


Click here to read this post in English

            मित्रो नयी पोस्ट मैं देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ।  महादेव ने मुझे किन्नौर कैलाश की यात्रा का सौभाग्य प्रदान किया था सो इसी यात्रा के कारण कुछ लिख नहीं पाया। इस अनुभव को भी आपके साथ जल्दी ही सांझा करूंगा। चलिए हम श्रीखंड महादेव यात्रा के वृतांत को आगे बढाते हैं।

           श्रीखंड महादेव के गरिमामयी दर्शन के बाद मैं अभी वहां पर और अधिक रुकना चाहता था। परन्तु तेज़ हवा, भीगे हुए जूते, कपडे और कंपकंपा देने वाली ठण्ड ने मुझे वापिस चलने पर मजबूर कर दिया । एक अंतिम प्रणाम एवं दर्शन के बाद मैं वापिस चल पड़ा। मैं जब शिखर पर पहुंचा था हो मैं बहुत ही थका हुआ था।  दर्शन ने मेरे अंदर एक नयी स्फूर्ति भर दी थी। वापसी पर भी सबसे पहले बर्फ से ढाका हुआ मैदान आया।  उस को पार करने के बाद बड़े बड़े पत्थरों पर से मैंने उतरना शुरू कर दिया।  

            बारिश की वजह से ग्लेशियर पर चलना मुश्किल हो रहा था।  मैं ग्लेशियर पर चलने  के लिए पहले हाथ में पकडे डंडे को बर्फ में गड़ा देता था फिर एक एड़ी उसके बाद दूसरी एड़ी बर्फ में गड़ा कर चल रहा था । इसी तरह से मैं आगे बढ़ रहा था।  एक जगह पर एक बड़ा सा ग्लेशियर पहाड़ की ढलान पर था और हम उसकी चोटी पर चल रहे थे।  जब मैंने डंडा गड़ाने के बाद एक पैर को उठाया तो बर्फ में गड़ा हुआ दूसरा पैर फिसल गया। और मैं फिसल गया। यह तो अच्छा था कि मैंने डंडा पकड़ रखा था। मैं बर्फ की ढलान पर लटक रहा था। यह तो अच्छा था कि मैंने डंडा पकड़ रखा था। मैंने अपने पाँव की पंजे बर्फ में गड़ा दिये। डंडे के सहारे और पंजे की स्पोर्ट की वजह से मैं नीचे नहीं फिसला। मेरे पीछे कुछ लोग आ रहे थे। एक लड़के ने अपना डंडा बर्फ मैं गाड़ा और मैंने उसे पकड़ लिया और धीरे धीरे ऊपर आ गया।  

                          बारिश की वजह से पत्थर काफी फिसलन भरे हो गए थे। फिसलन की वजह से मैं काफी बार गिरा या गिरते-गिरते बचा। यह शुक्र था की कोई चोट नहीं लगी। इस यात्रा मैं कोई पक्का रास्ता नहीं है सिर्फ कुछ पेंट के निशान पत्थरों पर कुछ दूरी पर लगा रखे हैं जिनको देख कर आगे बढ़ना होता है। मैं भी पथरीले रास्तों, ग्लेशियर, और बड़े बड़े पत्थरों पर चलता रहा। सुबह से कुछ खाया नहीं था और पानी भी ख़तम हो चुका था। मेरी चलने की गति धीरे धीरे कम होने लगी।  जो लोग चोटी से मेरे साथ चले पहाड़ों के वासी होने के कारण तेज़ चलते थे और काफी आगे निकल गए।  मैं अकेला चल रहा था। 

                          एक जगह पर दो निशान लगे थे। एक पगडंडी ऊपर  जा  रही थी और एक नीचे की तरफ। कुछ देर सोचने के बाद मैं नीचे वाली पगडण्डी की तरफ चल पड़ा।  करीब १०० - १५० मीटर चलने के बाद एक बड़ा सा पत्थर था। मैं उसके पार उतर गया। तब मुझे गलती का एहसास हुआ। मैं गलत रास्ते पर था और जिस पत्थर से मैं उतरा था और जिस तरफ मैं था वह एक बड़ी चट्टान थी जिस पर वापिस चढ़ पाना मेरे लिए असंभव था। मैं फँस चुका था।  दिमाग ने कुछ क्षण के लिए काम करना बंद कर दिया। एक तरफ बड़ी सी चट्टान थी जिस पर चढ़ना असंभव था दूसरी तरफ खाई थी जो एक ग्लेशियर से ढकी हुई थी। वह ग्लेशियर जिसे आम हालात में अगर मैं देखता तो मुझे सुन्दर लगता अब एक बड़े से अजगर की भांति प्रतीत हो रहा था जो मानो मुझे लीलने को तैयार बैठा था। मैंने अपने आप को संभाला और सोचना शुरु किया। जहाँ मैं खड़ा था उसके बिलकुल नीचे एक बहुत चिकनी और गोल  चट्टान थी। उस चट्टान के बिलकुल नीचे छोटी  समतल जगह थी और उससे सटे हुए कुछ छोटे पत्थर थे जिन पर  पर चढ़ कर वापिस पगडण्डी तक पहुंचा सकता था। परन्तु जो समतल जगह थी वह सिर्फ पैर  टिकाने भर के लिए पर्याप्त थी। ज़रा  सी चूक होने पर मैं सीधा खाई में जा गिरता। परन्तु इस के सिवा और कोई रास्ता नहीं था। भगवान का नाम ले कर मैंने उस गोल चट्टान पर सरकना शुरू किया और मैं उस समतल जगह पर उतर गया। फिर मैंने उन पत्थरों पर चढ़ कर पगडण्डी की तरफ जाना शुरू किया।एक पल के लिए मुझे मौत बिलकुल सामने दिखने लगी थी। 

                            जब मैं पगडण्डी की तरफ जा रहा था तभी मुझे ऊपर वाले रास्ते पर जाते हुए तीन लोग दिखे। मैंने उन्हें पुकारा और रुकने का इशारा किया। कुछ देर में मैं उनके पास पहुँच गया। जब मैंने उन्हें सारी बात बताई, तो उन्होंने मुझे बताया कि यह रास्ता पिछले साल का था। तब पगडण्डी से नीचे ग्लेशियर पर उतर कर उसके ऊपर से जाते थे। पत्थर गिरने से यह रास्ता बंद हो गया था पर किसी ने निशान मिटाने की कोशिश ही नहीं की। वह तीनों कुछ समय तक मेरे साथ चलते रहे।  जब सारे ग्लेशियर ख़तम हो गया तो उन्होंने अपने चाल पकड़ ली।

                           मैं अब तक बहुत थक चुका था और पानी न पीने के कारण गला सूख रहा था। मेरे चलने की गति भी बहुत 
कम हो गयी थी। धीरे धीरे चलते हुए मैं लगभग दो बजे अपने टेंट के पास पहुँच गया। मैं भीगा हुआ था और कपडों को कीचड भी लगा हुआ था। मैंने ज्योत्स्ना को आवाज़ लगाई। उसने मुझे टेंट से बाहर आ कर पानी और ग्लूकोस दिया।  लगभग एक घंटे बाद मेरी हालत ठीक हुई। 


                         कुछ देर बाद पता लगा कि मेरे सुबह जल्दी निकल जाने के कारण मैं यह यात्रा कर पाया क्योंकि लगातार बारिश के कारण यात्रा स्थगित कर दी गयी थी। लगभग चार बजे बादल छंटने शुरू हो गए हुए श्रीखंड महादेव के दर्शन पार्वती बाग से होने लगे।  दर्शन किये और हम आस पास के मनोरम दृश्य देखने में व्यस्त हो गए।   
View of Srikhand Mahadev from our tent. The thumb shaped peak in the middle is Srikhand Mahadev
हमारे टेंट से श्रीखंड महादेव का दृश्य 


               हमारे टेंट में से श्रीखंड महादेव का दृश्य।  मध्य में अंगूठे के आकार की नज़र आने वाली शिला श्रीखंड महादेव हैं। इस चित्र मैं चारों ओर बिखरी हुई बर्फ भी दिख रही है।
Srikhand Mahadev Closer view drenched in Sun.
ढलते सूर्य की किरणों से सराबोर श्रीखंड महादेव 
                             
                       कुछ समय बाद जो थोड़े बहुत बादल थे वह भी छंट गए और ढलते सूर्य की रौशनी से सराबोर श्रीखंड महादेव शिला और भी सुन्दर लग रही थी।

Flower bed and view of Bhim dwari, Kunda, Thacru from Parvati Bagh
पार्वती बाग़ से दूर तक का विहंगम दृश्य 

                           जब हमने दूसरी तरफ देखा तो काले बादलों में से कहीं नीला आसमान झाँक रहा था और कहीं पर सूर्य की किरणें छान कर आ रही थीं। काली घटाएं, दूर तक फैली हुई हरी घास की चादर और उसमें खिले हुए फूल, दूर पहाड़ों पर रुई के फाहों की तरह तैरते हुए  बादल किसी कवि की कविता की तरह लग रहे थे। यहाँ से बीच की पड़ाव भीम द्वारी, कुन्सा, काली घाटी भी दिख रहे थे।

चरागाहों में भेड़ें 
                                    मौसम के खुलते ही चरवाहे अपनी भेड़ें लेकर आ गए थे। हरी घास पर ये भेड़ें बिंदुओं की तरह लग रही थीं। हम काफी  दृश्यों का आनंद लेते रहे और फिर जल्दी ही सो गए।  कल हमें श्रीखंड महादेव यात्रा की वापसी करनी थी।

क्रमशः

Post a Comment