A Tryst with Royalty - Bikaner & Jaisalmer - Day 3 - Jaisalmer A Saga in Yellowstone - Hindi version


arid land and a train passing through
मरुस्थल में दूर से आती हुई रेलगाड़ी 

A Tryst with Royalty - Bikaner & Jaisalmer - Day 3 - Jaisalmer A Saga in Yellowstone


A Tryst with Royalty - Bikaner & Jaisalmer - Day 3 - Dash to Golden City

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कल बीकानेर में एक सुन्दर सी शाम बिताने के बाद किसी का बीकानेर से जाने का मन नहीं कर रहा था।  परन्तु चलते रहना तो जीवन का नियम है।  सुबह अलार्म बजते ही सब लोग उठ गए।  सुबह सुबह होटल के बगीचे में थोड़ी देर टहलने के पश्चात हम लोग तैयार हुए और नाश्ता करने के लिये  पहुँच गए। नाश्ते में रोज़ की तरह ढेर सारे व्यंजन थे और बहुत ही स्वादिष्ट थे अतः हम भूख से ज़्यादा ही खा गए।  अंत में हमने कुछ फोटो खेंचे और अपने अगली मंज़िल जैसलमेर की तरफ निकल पड़े।
Parting Shot at Laxmi Niwas Palace with The guard in full rajput attire and Moustache
लक्ष्मी निवास से विदा लेते समय पारिवारिक चित्र और साथ में है पूरे राजपूताना लिबास और मूंछों के साथ शाही दरबान 


Peacocks on the Parapet  of the palace
महल के परकोटों पर बैठे हुए मोर 
                   जाने के समय महल के परकोटों पर मोर आ कर बैठ गए। आम तौर पर मोर पास जाने पर भाग जाते हैं परन्तु आज वह भी शायद हमें जाने नहीं देना चाहते थे इसलिए अलग अलग अंदाज़ में फोटो खिंचवा रहे थे। 


Another one posing for the photograph
ये तो पूरी मॉडलिंग करने के मूड में था और हमें लेट करवा के ही मानेगा 
               
                          राजस्थान की सड़कें बहुत ही अच्छी हैं और मरुस्थल में होने के कारण मीलों दूर तक तीर सी सीधी नज़र आती हैं। ज्योत्स्ना एक बार फिर से राजस्थान की सडकों पर कार चलाने का आनंद उठाना चाहती थी इसलिए आज स्टीयरिंग उसने संभाला। शीघ्र ही हम बीकानेर शहर से बाहर आ गए और गाडी जैसलमेर की तरफ दौड़ रही थी।  जैसलमेर बीकनेर से लगभग 325 किलोमीटर दूर है। इनके बीच में कोई शहर नहीं आता है केवल कुछ छोटी छोटे कसबे आते है वो भी काफी दूरी पर।  एक ही जगह जिसका नाम याद रह जाता है वह है पोखरण। यह वही जगह है जहां पर भारत ने परमाणु विस्फोट किया था। यहाँ से निकलते हुए सर गर्व से ऊंचा हो जाता है क्यों कि इसी धरती पर भारत ने परमाणु शक्ति बनने की ओर अपना पहला कदम उठाया था। हम जैसलमेर तक बिना रुके ही चलते रहे। सड़क लगभग अच्छी थीं बस कहीं-कहीं पर कुछ काम चल रहा था।

                        रेगिस्तान में सपाट एवं सीधी सडकों पर गाडी चलाने का अपना ही आनंद है। वाहन बहुत कम मिलते हैं,   कभी कभार कोई बस या ऊंटगाड़ी मिल जाती है अथवा दूर से आती हुई रेलगाड़ी दिख जाती है।  हम पांच घंटे से भी काम समय में जैसलमेर पहुँच गए।


Board at the entrance of Jaisalmer. The fort is visible in the middle.
जैसलमेर का स्वागती बोर्ड और बीच में दिख रहा है जैसलमेर का किला 

                             जैसे ही हम जैसलमेर पहुँचने को हुए, जैसलमेर का किला दूर से ही दिखने लगा। यह दुर्ग जैसलमेर में लगभग हर जगह से दिखाई देता है।  शीघ्र ही हम अपने होटल में पहुँच गए।  मार्च में भी जैसलमेर में काफी गर्मी थी।  हमने होटल में फैमिली रूम लिया। होटल काफी साफ़ सुथरा था और दो चीज़ें जो सबसे अच्छी थी वो थीं बढ़िया एयरकण्डीशनिंग और कमरे की खिड़की में से सामने नज़र आता हुआ जैसलमेर का किला।

                              होटल के कमरे में सामान जमाने के बाद हम तरोताज़ा हुए और जैसलमेर दर्शन के लिए निकल पड़े।  जैसलमेर में हमने कोई प्लान नहीं बनाया था बस दर्शनीय स्थानों की लिस्ट भर थी। सबसे पहले हमने होटल के पास ही एक छोटा सा रेस्तरां ढूंढा और राजस्थानी थाली का स्वाद चखा। थाली बस ठीक ठाक थी।  उसके बाद हमने दो दिन के लिए एक गाइड लिया और निकल पड़े जैसलमेर घूमने। आइये पहले जैसलमेर के इतिहास पर नज़र डालें।


A Tryst with Royalty - Bikaner & Jaisalmer - Day 3 - The History of Golden city


                   जैसलमेर भारत के पश्चिमी छोर पर बसा हुआ है और राजस्थान का सबसे बड़ा जिला है।  जैसलमेर का इतिहास भी किसी फ़िल्मी कहानी जैसा है जिसमें विश्वास है, विश्वासघात है, खून ख़राबा है और वीरता के किस्से हैं, जो आज भी वहां के लोक गायकों द्वारा गाये जाते हैं। जैसलमेर की स्थापना भाटी राजपूत राजा, महारावल जैसल द्वारा की गयी थी। राजकुमार जैसल को उनके बड़े भाई जो कि भाटी शासक थे की मृत्यु के बाद उनके भतीजे का राज प्रतिनिधि नियुक्त किया गया। परन्तु जैसल ने अपने भतीजे से सत्ता हथिया ली। भाटी शासन की राजधानी उस समय लोदुर्वा जो की आज के जैसलमेर से 16 किलोमीटर दूर थी। जैसल को अन्य राजकुमारों के विद्रोह का डर था इसलिए वह अपनी राजधानी ऐसी जगह पर बनाना चाहता था जिसे जीत पाना असंभव हो।   

            इसी सम्बन्ध में उसकी मुलाकात ईसुल नामक सन्यासी से हुई जो की त्रिकुटा पहाड़ी पर एक गुफा में रहता था। उसने जैसल को अपनी राजधानी त्रिकुटा पहाड़ी पर स्थापित करने के लिया कहा। भाटी राजपूत अपने आप को चंद्रवंशी यानी कृष्ण जी के वंशज मानते हैं। एक दंतकथा के अनुसार युगों पहले कृष्ण जी ने भी यह भविष्यवाणी की थी की उनके वंशज इस जगह पर राज्य करेंगे।  इस भविष्यवाणी ने जैसल के त्रिकुटा पहाड़ी पर राजधानी स्थापित करने के निश्चय को और दृढ़ कर दिया। सन 1156 में जैसलमेर दुर्ग बन कर तैयार हुआ। उस संत ने यह भी भविष्यवाणी की थी कि  इस किले पर दो बार शत्रु का कब्ज़ा हो जायेगा और यह भविष्यवाणी सही साबित हुई। 

                     जैसलमेर भारत से पर्शिया ( आज का ईरान) और अफ्रीका जाने वाले व्यापार मार्ग पर स्थित था। व्यपारियों  के काफिले यहाँ पर रुक कर विश्राम करते थे इससे यहाँ के लोगों को आमदनी होती थी और राजा इन काफिलों से कर वसूलते थे।  इससे जैसलमेर समृद्ध होने लगा। इस अभेद्य दुर्ग का पहला पतन तब हुआ जब भाटियों ने अल्लाउदीन खिलजी का शाही खज़ाना ले जा रहे काफिले पर धावा बोल दिया। गुस्से में अल्लाउदीन खिलजी की सेना ने जैसलमेर किले की घेराबंदी कर ली।  नौ साल तक चली इस घेराबंदी के बाद जब और देर तक शत्रु को रोक पाना संभव नहीं था तो राजपूतानियों ने जौहर किया और राजपूत केसरिया साफा बांध कर दुश्मनों की सेना पर बिजली की तरह टूट पड़े। परन्तु खिलजी की विशाल सेना के आगे उनकी वीरता कम पड़ गयी और वे सब वीरगति को प्राप्त हुए। 

                    दूसरी बार भाटियों ने सुल्तान फ़िरोज़शाह के खेमे पर हमला कर दिया। इतिहास फिर दोहराया गया। जौहर फिर हुआ और जैसलमेर किले पर फिर एक बार मुग़लों का कब्ज़ा हुआ। 

                                 इस रोंगटे खड़े कर देने वाले इतिहास को समेटे हुए इस किले और बाकी धरोहरों की यात्रा हम कल करेंगे। 
                                

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